वृंदावन में आयोजित जीवनदीप आश्रम के लोकार्पण समारोह में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मध्यप्रदेश और ब्रज क्षेत्र के ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा कि यह रिश्ता हजारों वर्षों से जीवंत बना हुआ है। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में ब्रजभूमि में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करने के बाद उज्जैन स्थित सांदीपनि आश्रम में शिक्षा ग्रहण की थी, जिससे उज्जयिनी का योगदान उनके विराट व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण रूप से जुड़ता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि जिस प्रकार मथुरा-वृंदावन सनातन परंपरा के प्रमुख केंद्र रहे हैं, उसी तरह मध्यप्रदेश भी सनातन विचारधारा के संरक्षण और विस्तार में निरंतर भूमिका निभाता आया है।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी यतींद्र आनंद गिरि, महामंडलेश्वर अवधेशानंद जी, साध्वी ऋतंभरा और बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान सहित अनेक संत-महात्मा और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत बालकों द्वारा हनुमान चालीसा के पाठ से हुई, जिसके बाद मुख्यमंत्री ने “सनातन धर्म और जीवन दर्शन” विषयक पुस्तक का विमोचन भी किया।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अपने संबोधन में उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ-2028 की तैयारियों का उल्लेख करते हुए उपस्थित संत समाज को इस महाआयोजन में सहभागी बनने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने स्वामी यतींद्र आनंद गिरि के आध्यात्मिक योगदान और समाजसेवा के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रयास समाज को नई दिशा देते हैं।
इस अवसर पर डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि वैश्विक स्तर पर कई व्यवस्थाएं अस्थिरता के दौर से गुजर रही हैं, लेकिन सनातन धर्म और संस्कृति ने हर चुनौती के बावजूद अपनी गरिमा बनाए रखी है। उन्होंने इस निरंतरता के पीछे संतों और आश्रमों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। साध्वी ऋतंभरा ने जीवनदीप आश्रम को वृंदावन की आध्यात्मिक समृद्धि में एक नई कड़ी बताते हुए कहा कि व्यक्ति की सबसे बड़ी बाधा उसके भीतर होती है, जिसे दृढ़ संकल्प और पूर्ण समर्पण से ही पार किया जा सकता है।
बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने भारतीय संस्कृति को ज्ञान की सतत प्रवाहमान धारा बताते हुए विश्वास जताया कि जीवनदीप आश्रम भविष्य में ज्ञान और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा। कुल मिलाकर, यह आयोजन न केवल एक आश्रम के लोकार्पण तक सीमित रहा, बल्कि सनातन परंपरा, आध्यात्मिक मूल्यों और सामाजिक समरसता के संदेश को सशक्त रूप से सामने लाने वाला मंच भी बना।